चंद्रयान 2 के बारे में जानकारी जो आपको जाननी चाहिए

चंद्रयान 2 के बारे में जानकारी जो आपको जाननी चाहिए

20 जुलाई 1969 को अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग और बज़ एल्ड्रिन ने Apollo 11 मिशन के दौरान पहली बार चंद्रमा की सतह पर कदम रखा था। चंद्रमा पर मानव की पहली लैंडिंग की यह ऐतिहासिक घटना आज भी अंतरिक्ष अन्वेषण के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इसी तरह भारत के चंद्रयान मिशन ने भी चंद्रमा को समझने की दिशा में देश की वैज्ञानिक क्षमता को दुनिया के सामने रखा।

भारत का चंद्रयान-2 इसी अंतरिक्ष यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। यह भारत का दूसरा चंद्र मिशन था, जिसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने 22 जुलाई 2019 को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया था। मिशन का लक्ष्य चंद्रमा की सतह, उसके खनिजों, पानी से जुड़े संकेतों और खास तौर पर चंद्र दक्षिणी ध्रुव के बारे में अधिक जानकारी जुटाना था।

चंद्रयान-2 क्या है?

चंद्रयान-2 भारत का दूसरा चंद्र अन्वेषण मिशन था और यह अक्टूबर 2008 में लॉन्च किए गए चंद्रयान-1 के बाद विकसित किया गया था। चंद्रयान-1 ने चंद्रमा पर पानी के अणुओं से जुड़े महत्वपूर्ण प्रमाण जुटाने में योगदान दिया था, जबकि चंद्रयान-2 का उद्देश्य चंद्र सतह और उप-सतह का अधिक विस्तृत अध्ययन करना था।

ISRO के अनुसार चंद्रयान-2 एक जटिल मिशन था जिसमें तीन प्रमुख हिस्से शामिल थे—ऑर्बिटर, विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर। इन तीनों को मिलकर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र का अध्ययन करने के लिए तैयार किया गया था।

भारत के वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष अभियंताओं के लिए यह मिशन इसलिए भी महत्वपूर्ण था क्योंकि इसमें चंद्रमा की कक्षा में काम करने के साथ-साथ सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग और रोवर संचालन जैसी तकनीकों को प्रदर्शित करने की योजना थी।

चंद्रयान-2 का लॉन्च कब हुआ था?

चंद्रयान-2 को 22 जुलाई 2019 को GSLV Mk III-M1 रॉकेट की मदद से लॉन्च किया गया था। लॉन्च श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से हुआ था। मिशन की शुरुआत पृथ्वी की कक्षा से हुई और इसके बाद अंतरिक्ष यान ने कई कक्षीय युद्धाभ्यासों के माध्यम से अपनी कक्षा को धीरे-धीरे बढ़ाया।

14 अगस्त 2019 को Trans Lunar Injection के बाद चंद्रयान-2 पृथ्वी की कक्षा से निकलकर चंद्रमा की ओर बढ़ा। 20 अगस्त 2019 को इसे सफलतापूर्वक चंद्र कक्षा में स्थापित किया गया। इसके बाद लैंडर को ऑर्बिटर से अलग करने की प्रक्रिया शुरू हुई।

चंद्रयान-2 के तीन प्रमुख हिस्से

चंद्रयान-2 मिशन को तीन प्रमुख हिस्सों में बांटा गया था। प्रत्येक मॉड्यूल की अपनी अलग भूमिका थी।

1. ऑर्बिटर

ऑर्बिटर का काम चंद्रमा की कक्षा में रहकर उसकी सतह और आसपास के वातावरण का अध्ययन करना था। इसमें कई वैज्ञानिक उपकरण लगाए गए थे, जिनकी मदद से चंद्र सतह की तस्वीरें, खनिजों से जुड़ी जानकारी और अन्य वैज्ञानिक डेटा एकत्र किया जाना था।

ऑर्बिटर विक्रम लैंडर के साथ संचार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था और पृथ्वी तक मिशन से जुड़ी जानकारी पहुंचाने में मदद करता था। शुरुआत में ऑर्बिटर की नियोजित मिशन लाइफ लगभग एक वर्ष बताई गई थी, लेकिन ISRO के अनुसार सटीक कक्षीय संचालन और मिशन प्रबंधन के कारण इसकी कार्यक्षमता लगभग सात वर्षों तक बढ़ गई।

2. विक्रम लैंडर

चंद्रयान-2 के लैंडर का नाम विक्रम रखा गया था। इसका नाम भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक माने जाने वाले डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया। लैंडर को चंद्रमा की सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग के लिए डिजाइन किया गया था।

विक्रम लैंडर का मुख्य उद्देश्य सुरक्षित रूप से चंद्र सतह पर उतरना और उसके अंदर रखे प्रज्ञान रोवर को सतह पर तैनात करना था। 7 सितंबर 2019 को विक्रम की सॉफ्ट लैंडिंग का प्रयास किया गया, लेकिन लैंडर के साथ संपर्क स्थापित नहीं रह सका और नियोजित लैंडिंग पूरी नहीं हो पाई।

3. प्रज्ञान रोवर

प्रज्ञान छह पहियों वाला रोवर था, जिसे चंद्र सतह पर सीमित दूरी तक चलकर वैज्ञानिक प्रयोग करने के लिए तैयार किया गया था। 'प्रज्ञान' शब्द का अर्थ संस्कृत में ज्ञान या बुद्धिमत्ता से जुड़ा है। इसे विक्रम लैंडर के अंदर रखा गया था और सफल लैंडिंग के बाद इसे चंद्र सतह पर उतारने की योजना थी।

पृथ्वी से चंद्रमा तक कैसे पहुंचा चंद्रयान-2?

चंद्रयान-2 सीधे एक ही चरण में चंद्रमा तक नहीं पहुंचा। लॉन्च के बाद अंतरिक्ष यान पृथ्वी की कक्षा में गया और कई कक्षीय युद्धाभ्यासों के माध्यम से उसकी कक्षा को बढ़ाया गया। इससे अंतरिक्ष यान को आवश्यक ऊर्जा और गति प्राप्त हुई।

इसके बाद Trans Lunar Injection के जरिए चंद्रयान-2 को चंद्रमा की दिशा में भेजा गया। चंद्र कक्षा में पहुंचने के बाद अंतरिक्ष यान ने निर्धारित कक्षीय प्रक्रियाएं पूरी कीं और विक्रम लैंडर को ऑर्बिटर से अलग किया गया।

यह पूरी प्रक्रिया इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि चंद्रमा तक पहुंचने वाले मिशन में केवल रॉकेट लॉन्च ही चुनौती नहीं होता। सही कक्षा, गति, संचार और समय पर किए गए प्रत्येक maneuver मिशन की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

चंद्रयान-2 के वैज्ञानिक उद्देश्य

चंद्रयान-2 का उद्देश्य केवल चंद्रमा की तस्वीरें लेना नहीं था। मिशन को चंद्रमा की उत्पत्ति और विकास को बेहतर तरीके से समझने के लिए कई वैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए तैयार किया गया था।

  • चंद्र सतह की विस्तृत मैपिंग करना।

  • चंद्रमा की सतह पर मौजूद खनिजों और तत्वों का अध्ययन करना।

  • चंद्रमा की सतह और उप-सतह में पानी से जुड़े संकेतों का अध्ययन करना।

  • चंद्रमा की टोपोग्राफी और सतह की संरचना को समझना।

  • चंद्रमा के कमजोर वातावरण यानी exosphere का अध्ययन करना।

  • चंद्र दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र के बारे में अधिक वैज्ञानिक जानकारी हासिल करना।

ISRO के अनुसार चंद्र दक्षिणी ध्रुव विशेष रूप से दिलचस्प क्षेत्र है क्योंकि यहां ऐसे क्षेत्र मौजूद हैं जहां सूर्य का प्रकाश बहुत लंबे समय तक नहीं पहुंचता। इन permanently shadowed क्षेत्रों में पानी की बर्फ की मौजूदगी की संभावना ने वैज्ञानिक रुचि को और बढ़ाया।

ऑर्बिटर में कौन-कौन से वैज्ञानिक उपकरण थे?

चंद्रयान-2 ऑर्बिटर में कई वैज्ञानिक payloads लगाए गए थे। इनमें चंद्रमा की सतह की मैपिंग, खनिजों की पहचान, पानी से जुड़े संकेतों और सतह की संरचना का अध्ययन करने वाले उपकरण शामिल थे।

Terrain Mapping Camera-2 (TMC-2) चंद्र सतह की तस्वीरें लेने और उसके आधार पर विस्तृत 3D मैपिंग में मदद करने के लिए तैयार किया गया था। इससे चंद्र सतह की भौगोलिक संरचना को समझने में सहायता मिलती है।

Miniature Synthetic Aperture Radar (Mini-SAR) का उद्देश्य चंद्र सतह और ध्रुवीय क्षेत्रों में मौजूद संभावित जल-बर्फ से जुड़े संकेतों का अध्ययन करना था। Radar तकनीक ऐसे क्षेत्रों का अध्ययन करने में उपयोगी हो सकती है जहां सामान्य कैमरों से जानकारी प्राप्त करना कठिन होता है।

ऑर्बिटर में लगा Orbiter High Resolution Camera (OHRC) भी मिशन के महत्वपूर्ण उपकरणों में से एक था। ISRO के अनुसार, इस कैमरे की spatial resolution लगभग 25 सेंटीमीटर थी जब यह 100 किलोमीटर की चंद्र कक्षा से काम करता था।

चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव को क्यों चुना गया?

चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव वैज्ञानिकों के लिए लंबे समय से विशेष रुचि का क्षेत्र रहा है। यहां कई ऐसे गड्ढे और क्षेत्र हैं जहां सूर्य का प्रकाश बहुत कम या लंबे समय तक नहीं पहुंचता। इन क्षेत्रों को लेकर वैज्ञानिकों की रुचि का एक बड़ा कारण संभावित जल-बर्फ है।

चंद्रयान-2 ने इसी चुनौतीपूर्ण क्षेत्र को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रयास किया। चंद्रमा पर पानी की मौजूदगी और उसके वितरण को बेहतर तरीके से समझना भविष्य के चंद्र मिशनों के लिए भी उपयोगी हो सकता है।

भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों और महान वैज्ञानिकों के बारे में पढ़ने के लिए आप सीवी रमन की जीवन कहानी भी पढ़ सकते हैं।

विक्रम लैंडर की लैंडिंग के दौरान क्या हुआ?

चंद्रयान-2 का सबसे चुनौतीपूर्ण चरण विक्रम लैंडर की चंद्र सतह पर सॉफ्ट लैंडिंग था। लैंडर को ऑर्बिटर से अलग करने के बाद उसे चंद्र सतह की ओर उतरना था और इसके बाद प्रज्ञान रोवर को तैनात करना था।

7 सितंबर 2019 को लैंडिंग का प्रयास किया गया। लैंडिंग के अंतिम चरण के दौरान विक्रम लैंडर से संपर्क टूट गया और निर्धारित सॉफ्ट लैंडिंग पूरी नहीं हो सकी। हालांकि, इस घटना के बावजूद चंद्रयान-2 मिशन को केवल लैंडर की लैंडिंग के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। इसका ऑर्बिटर सफलतापूर्वक चंद्र कक्षा में काम करता रहा और वैज्ञानिक डेटा उपलब्ध कराता रहा।

ISRO के अनुसार, चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर ने चंद्रमा की मैपिंग और वैज्ञानिक अध्ययन में महत्वपूर्ण योगदान जारी रखा। इसने मिशन के कई वैज्ञानिक उद्देश्यों को आगे बढ़ाने में मदद की।

चंद्रयान-2 ऑर्बिटर क्यों रहा महत्वपूर्ण?

विक्रम की लैंडिंग पूरी न हो पाने के बावजूद ऑर्बिटर मिशन का एक बड़ा वैज्ञानिक हिस्सा बना रहा। इसमें लगे विभिन्न उपकरणों ने चंद्रमा की सतह, खनिज संरचना, पानी से जुड़े संकेतों और ध्रुवीय क्षेत्रों के अध्ययन में योगदान दिया।

विशेष रूप से उच्च-रिज़ॉल्यूशन कैमरे से प्राप्त तस्वीरों ने चंद्र सतह को बहुत अधिक detail में देखने की क्षमता दी। इसके अलावा, ऑर्बिटर की लंबी कार्यक्षमता ने वैज्ञानिकों को लंबे समय तक चंद्रमा का निरीक्षण करने का अवसर दिया।

चंद्रयान-1 और चंद्रयान-2 में क्या अंतर था?

चंद्रयान-1 भारत का पहला चंद्र मिशन था और इसका मुख्य उद्देश्य चंद्रमा की कक्षा से वैज्ञानिक अध्ययन और मैपिंग करना था। चंद्रयान-2 ने इस दिशा में एक और बड़ा कदम उठाया क्योंकि इसमें ऑर्बिटर के साथ लैंडर और रोवर भी शामिल किए गए थे।

चंद्रयान-1 ने चंद्रमा पर पानी के अणुओं से जुड़े महत्वपूर्ण प्रमाण खोजने में योगदान दिया था। चंद्रयान-2 ने पानी और चंद्र सतह से जुड़े सवालों की आगे जांच के साथ-साथ दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र का अधिक विस्तृत अध्ययन करने की कोशिश की।

अंतरिक्ष विज्ञान और तकनीक में भारत की अन्य उपलब्धियों के साथ-साथ वैज्ञानिकों के योगदान को समझने के लिए एपीजे अब्दुल कलाम के रोचक तथ्य भी पढ़े जा सकते हैं।

चंद्रयान-2 के बारे में रोचक तथ्य

  • चंद्रयान-2 भारत का दूसरा चंद्र अन्वेषण मिशन था।

  • इसे 22 जुलाई 2019 को GSLV Mk III-M1 से लॉन्च किया गया था।

  • मिशन में Orbiter, Vikram Lander और Pragyan Rover शामिल थे।

  • विक्रम का नाम डॉ. विक्रम साराभाई के सम्मान में रखा गया था।

  • प्रज्ञान छह पहियों वाला रोवर था।

  • मिशन का एक प्रमुख लक्ष्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र का अध्ययन करना था।

  • विक्रम की सॉफ्ट लैंडिंग का प्रयास 7 सितंबर 2019 को किया गया था।

  • चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर निर्धारित एक वर्ष की योजना से कहीं अधिक समय तक काम करने में सक्षम रहा।

  • ऑर्बिटर में Orbiter High Resolution Camera सहित कई वैज्ञानिक payloads मौजूद थे।

चंद्रयान-2 की विरासत और आगे की राह

चंद्रयान-2 ने भारत के चंद्र अन्वेषण कार्यक्रम में कई महत्वपूर्ण तकनीकी और वैज्ञानिक अनुभव जोड़े। विक्रम की लैंडिंग का प्रयास अपेक्षित परिणाम तक नहीं पहुंच सका, लेकिन मिशन से मिले अनुभवों ने भारत के भविष्य के lunar missions के लिए महत्वपूर्ण सीख प्रदान की।

बाद में चंद्रयान-3 को चंद्रमा पर सुरक्षित सॉफ्ट लैंडिंग और रोवर संचालन की क्षमता प्रदर्शित करने के follow-on mission के रूप में विकसित किया गया। इस तरह चंद्रयान-2 की उपलब्धियां और उससे मिली सीख भारत के आगे के चंद्र अभियानों की नींव का हिस्सा बनीं।

भारत के वैज्ञानिक विकास की कहानी केवल अंतरिक्ष तक सीमित नहीं है। देश के प्रमुख वैज्ञानिकों और उनके योगदान के बारे में जानने के लिए आप भारतीय वैज्ञानिक सीवी रमन से जुड़ा हमारा लेख भी पढ़ सकते हैं।

Frequently Asked Questions: चंद्रयान-2 से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

चंद्रयान-2 कब लॉन्च हुआ था?

चंद्रयान-2 को 22 जुलाई 2019 को GSLV Mk III-M1 रॉकेट से श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया गया था।

चंद्रयान-2 में कितने हिस्से थे?

चंद्रयान-2 में तीन प्रमुख हिस्से थे—ऑर्बिटर, विक्रम लैंडर और प्रज्ञान रोवर।

क्या विक्रम लैंडर चंद्रमा पर सफलतापूर्वक उतर पाया था?

नहीं। 7 सितंबर 2019 को विक्रम की सॉफ्ट लैंडिंग का प्रयास किया गया था, लेकिन अंतिम चरण में लैंडर से संपर्क टूट गया और नियोजित सॉफ्ट लैंडिंग पूरी नहीं हो सकी।

चंद्रयान-2 ऑर्बिटर का क्या हुआ?

ऑर्बिटर सफलतापूर्वक चंद्र कक्षा में स्थापित हुआ और उसने वैज्ञानिक अध्ययन जारी रखा। ISRO के अनुसार इसकी कार्यक्षमता नियोजित एक वर्ष से बढ़कर लगभग सात वर्ष तक पहुंच गई।

चंद्रयान-2 का मुख्य उद्देश्य क्या था?

इसका उद्देश्य चंद्रमा की सतह, खनिज संरचना, टोपोग्राफी, पानी से जुड़े संकेतों और चंद्र दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र का वैज्ञानिक अध्ययन करना था।

प्रज्ञान रोवर का क्या काम था?

प्रज्ञान एक छह पहियों वाला रोवर था, जिसे चंद्र सतह पर चलकर वैज्ञानिक प्रयोग और स्थानीय अध्ययन करने के लिए डिजाइन किया गया था।

निष्कर्ष

चंद्रयान-2 भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के सबसे महत्वाकांक्षी चंद्र मिशनों में से एक था। हालांकि विक्रम लैंडर की सॉफ्ट लैंडिंग योजना के अनुसार पूरी नहीं हो सकी, लेकिन मिशन का ऑर्बिटर सफल रहा और लंबे समय तक चंद्रमा का अध्ययन करता रहा।

इस मिशन ने भारत की अंतरिक्ष तकनीक, चंद्र विज्ञान और भविष्य के lunar exploration कार्यक्रम को महत्वपूर्ण अनुभव दिया। चंद्रयान-2 की कहानी यह भी बताती है कि अंतरिक्ष अनुसंधान में किसी एक चरण की असफलता पूरे मिशन की वैज्ञानिक उपलब्धियों को समाप्त नहीं करती।

यदि आपको विज्ञान, वैज्ञानिकों और भारत की उपलब्धियों से जुड़े लेख पसंद हैं, तो मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के बारे में जानें और शिक्षा तथा वैज्ञानिक सोच के महत्व को भी समझें।

छवि क्रेडिट: Popular Mechanics

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